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प्रयागराज: महाकुंभ का पावन पर्व जो करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को दर्शाता है। 13 जनवरी से प्रयागराज में शुरू हो रहा है। यह अवसर सनातन संस्कृति की महानता को दर्शाता है और साधू-संतों, करोड़ों श्रद्धालुओं को अध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि करोड़ों वर्ष पूर्व देवताओं और दानवों के बीच समुंद्र मंथन के बीच जो अमृत निकला था, उसकी कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिर गईं थीं। इन्हीं स्थानों पर हर 12 वर्ष में कुंभ का आयोजन किया जाता है। इस बार का महाकुंभ 13 जनवरी से 26 फरवरी तक आयोजित होगा।
महाकुंभ का अमृत कुंभ से क्या है संबंध
पौराणिक मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि समुंद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कुंभ लेकर आए थे, तब देवताओं और दानवों के बीच अमृत प्राप्ति को लेकर संघर्ष छिड़ गया था।
भगवान विष्णु ने अमृत को सुरक्षित रखने और संघर्ष को रोकने के लिए मोहिनी का रूप धारण किया। उन्होने अमृत कलश को सुरक्षित रखने के लिए इंद्रदेव के पुत्र जयंत को सौंप दिया। जब जयंत अमृत कलश लेकर आकाश मार्ग से चले तो दानवों ने उनका पीछा किया। इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिर गईं। समुंद्र मंथन के बारे में शिव पुराण, मत्स्य पुराण और भविष्य पुराण सहित लगभग हर पुराण में जिक्र किया गया है।
इन स्थानों पर गिरी अमृत की बूंदें
जब इंद्रदेव के पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर जा रहे थे, जब दानवों ने उनका पीछा किया। जिसमें अमृत की बूंदे प्रयागराज में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर, हरिद्वार में गंगा नदी में, उज्जैन में क्षिप्रा नदी में और नासिक में गोदावरी नदी में गिरीं। जिसके बाद इन स्थानों पर कुंभ की परंम्परा शुरू हुई। कुंभ मेला हर 12 साल में आयोजित किया जाता है वहीं हर 6 साल में अर्ध कुंभ मेले आयोजित होता है।
प्रयागराज में यहां होता है कुंभ मेला
प्रयागराज में कुंभ मेला विशेष रूप से संगम तट पर आयोजित होता है। जहां गंगा,यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है। कुंभ मेले में संगम तट पर लाखों श्रद्धालु और साधू-संत स्नान करते हैं। साथ ही पूजा अर्चना करते हुए ईश्वर से आशिर्वाद प्राप्त करते हैं।
कुंभ मेले का इतिहास
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार कुंभ मेले का आयोजन 850 साल से भी पुराना है। शंकराचार्य द्वारा महाकुंभ की शुरूआत की गई थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार कुंभ का आयोजन समुंद्र मंथन के बाद से ही किया जा रहा है।
जबकी कुछ विद्वानों का कहना है कि गुप्त काल से इसकी शुरूआत हुई थी। लेकिन सम्राट हर्ष वर्धन से इसके प्रमाण मिलते हैं, इसी के बाद शंकराचार्य और उनके शिष्यों द्वारा संगम तट पर सन्यासी अखाड़ो के लिए शाही स्नान की तैयारी की गई थी।
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Published : 10 January 2025, 4:49 PM IST
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