Balrampur News: बिजलेश्वरी देवी मंदिर की क्या है खासियत, दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं श्रद्धालु
बिजलीपुर मंदिर जिले वासियों के आस्था का प्रतीक है। इस मंदिर से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है। पढ़िये डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट

बलरामपुर: यूपी के बलरामपुर जिला मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर बिजलेश्वरी देवी का मंदिर है। ये मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां देवी दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगती है। इन विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर में मुंडन संस्कार समेत अन्य शुभ कार्य संपन्न कराए जाते हैं।
डाइनामाइट न्यूज संवाददाता के अनुसार मां बिजलेश्वरी मंदिर नगर क्षेत्र समेत ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां साल भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
मंदिर की ऐतिहासिक मान्यता
बिजलेश्वरी देवी मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार देवी मां यहां बिजली के रूप में प्रकट हुई थीं, जिसके कारण इस स्थान का नाम बिजलीपुर पड़ा और मंदिर को बिजलेश्वरी देवी के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर निर्माण से जुड़ी एक किवदंती के अनुसार संत बाबा जयराम भारती राप्ती नदी के तट पर कुटिया बनाकर रहते थे और प्रतिदिन नदी पार कर शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर दर्शन के लिए जाते थे। एक बार जब भयंकर बाढ़ आई और वह नदी पार नहीं कर सके तो भूखे-प्यासे रहने लगे। उनकी भक्ति और तपस्या को देखकर देवी मां ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अब उन्हें देवीपाटन जाने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि अब इस स्थान पर स्वयं उनकी पूजा होगी।
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देवी मां के पदचिह्न आज भी मौजूद
इस स्थान पर देवी मां के पदचिह्न आज भी मौजूद हैं। बलरामपुर के तत्कालीन महाराजा को जब इस दिव्य घटना की जानकारी मिली तो वह भी देवी दर्शन के लिए यहां पहुंचे। देवी मां के प्रति अपनी भक्ति दिखाने के लिए उन्होंने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की स्थापना और निर्माण मंदिर की स्थापना के संबंध में यह भी कहा जाता है कि करीब डेढ़ सौ साल पहले यहां एक देवी स्थल और पीपल का पेड़ था।
मनोकामना होती है पूरी
बलरामपुर के तत्कालीन राजा दिग्विजय सिंह ने अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए यहां मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। जब वे निर्माण कार्य शुरू करने पहुंचे तो उन्होंने वहां एक पीपल का पेड़ देखा, जिसे देवता के रूप में पूजा जाता था। इससे राजा दुविधा में पड़ गए। उनकी स्थिति को समझते हुए देवी ने बिजली के रूप में पेड़ पर गिरी और उसे नष्ट कर दिया तथा मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इसके बाद बलरामपुर के राजा ने मंदिर का निर्माण कराया और काशी के विद्वान पंडितों को बुलाकर श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा कराई। तभी से यह मंदिर बिजलेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस मंदिर में मुख्य रूप से श्रीयंत्र की पूजा की जाती है।
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भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में सच्ची श्रद्धा और समर्पण से पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी मान्यता के कारण यहां साल भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है, खासकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां आसपास के जिलों से हजारों की संख्या में भक्त पूजा-अर्चना करने आते हैं। बिजलेश्वरी देवी मंदिर न केवल आस्था और भक्ति का केंद्र है, बल्कि अपनी अद्भुत शिल्पकला के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर का गर्भगृह मां आदि शक्ति का स्थान है, जबकि अन्य देवी-देवताओं के मंदिर चारों दिशाओं में स्थित हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।