उत्तराखंड में मदरसों के खिलाफ कार्रवाई, सरकार और मुस्लिम संगठनों के बीच बढ़ा टकराव
उत्तराखंड में मदरसों के खिलाफ लगातार विरोध जारी है। ऐसे में सरकार और मुस्लिम संगठनों के बीच जंग छिड़ चुकी है। पढ़िये डाइनामाइट न्यूज़ की पूरी रिपोर्ट

हरिद्वार: उत्तराखंड में मदरसों के खिलाफ सरकार की कार्रवाई पूरे मार्च महीने जारी रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाले प्रशासन ने अब तक 136 मदरसों को सील कर दिया है और उनकी फंडिंग की जांच के आदेश दिए गए हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम केवल उन मदरसों के खिलाफ उठाया गया है जो गैर-पंजीकृत हैं या जिनके दस्तावेज अधूरे पाए गए हैं।
डाइनामाइट न्यूज़ संवाददाता के अनुसार, सरकार का दावा है कि यह कार्रवाई अवैध रूप से संचालित मदरसों पर लगाम लगाने के उद्देश्य से की जा रही है। मुख्यमंत्री कार्यालय को सौंपी जाने वाली रिपोर्ट में उन मदरसों के बारे में विस्तृत जानकारी शामिल होगी जो नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि सभी शिक्षण संस्थानों को समान नियमों के दायरे में लाना उनकी प्राथमिकता है। शिक्षा विभाग का तर्क है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
मुस्लिम संगठनों का विरोध
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सरकार की इस कार्रवाई का मुस्लिम संगठनों ने कड़ा विरोध किया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। संगठन का कहना है कि यह कदम अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों का हनन है और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है। मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि सरकार सिर्फ मदरसों को निशाना बना रही है, जबकि अन्य गैर-पंजीकृत शिक्षण संस्थानों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। उनका कहना है कि यह कदम एक खास समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच मतभेद भी सामने आए हैं।विपक्षी दलों ने सरकार पर धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया है, जबकि कुछ संगठनों ने इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में उठाया गया सही कदम बताया है। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि सरकार को मदरसों को बंद करने के बजाय उन्हें बेहतर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
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आगे क्या होगा?
सरकार और मुस्लिम संगठनों के बीच यह टकराव अब कानूनी रूप ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अहम होगी, क्योंकि इसका असर राज्य की शिक्षा नीतियों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर पड़ सकता है। अगर कोर्ट सरकार के पक्ष में फैसला सुनाता है तो अन्य राज्यों में भी इसी तरह की कार्रवाई हो सकती है। वहीं अगर मुस्लिम संगठनों का पक्ष मजबूत साबित होता है तो इससे सरकार की नीति पर सवाल उठेंगे। इस मुद्दे पर कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित कर सकती हैं।